‘स्टैगफ्लेशन’ के साये में : समग्र व्यापक आर्थिक परिदृश्य

ऊंची ऋण लागत उपभोग को और कम कर सकती है

Published - March 20, 2023 11:29 am IST

ताजा वैश्विक वित्तीय घटनाक्रम और भारत के हाल के आर्थिक आंकड़े, दोनों मिलकर भारत सहित दुनिया भर की कई प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के कमजोर बना देने वाली मुद्रास्फीतिजनित मंदी (स्टैगफ्लेशन) की ओर बढ़ने की आशंका को जन्म दे रहे हैं। पिछले सप्ताह भारत के एनएसओ से प्राप्त फरवरी माह के आंकड़ों में खुदरा मुद्रास्फीति 6.44 फीसदी दर्ज की गई है। खुदरा मुद्रास्फीति का यह आंकड़ा साफ तौर पर भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) द्वारा चौथी तिमाही के दौरान मुद्रास्फीति के 5.7 फीसदी रहने के हालिया पूर्वानुमान को झुठलाता है। जनवरी माह में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई)-आधारित महंगाई दर के 6.52 फीसदी रहने के मद्देनजर आरबीआई के अनुमान को सच साबित करने के लिए मार्च महीने में कीमतों में इतनी तेजी से नरमी लानी होगी कि यह हेडलाइन आंकड़े को 230 आधार अंकों से भी ज्यादा नीचे खिसकाते हुए मुद्रास्फीति को 4.1 फीसदी के स्तर पर पहुंचा दे। मुद्रास्फीति को प्रेरित करने वाले विभिन्न घटकों पर एक नजर डालने से यह पता चलता है कि खाद्य और ईंधन की कीमतों के असर का खुलासा करने वाली मूलभूत मुद्रास्फीति (कोर इन्फ्लेशन) अभी भी लगातार तीसरे महीने 6.2 फीसदी के स्तर पर बनी हुई है और मई 2021 से यह लगभग छह फीसदी के स्तर पर या उससे ऊपर मंडरा रही है। पिछले मई से आरबीआई द्वारा अपने बेंचमार्क

ब्याज दर में 250 आधार अंकों की बढ़ोतरी करने के बावजूद मूलभूत मुद्रास्फीति लगातार ऊंची बनी हुई है। इससे ऋण लागत में वृद्धि करके मांग में कमी लाते हुए महंगाई पर रोक लगाने में हो रही मौद्रिक अधिकारियों की दिक्कतों का पता चलता है। गवर्नर शक्तिकांत दास और आरबीआई के मौद्रिक नीति समिति के दो अन्य सदस्यों ने फरवरी में हुई अपनी पिछली नीतिगत बैठक में मूलभूत मुद्रास्फीति की चिंताजनक मजबूती का हवाला देते हुए सख्त मौद्रिक नीति को जारी रखने का औचित्य ठहराया था।

हालात को और गंभीर बनाते हुए समग्र खाद्य मूल्य सूचकांक में पिछले महीने पांच आधार अंकों की मामूली गिरावट के बावजूद खाद्य वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी भी निराशाजनक रुझान दिखा रही है। खाद्य वस्तुओं की चार प्रमुख श्रेणियों की कीमतें साल-दर-साल आधार पर ऊंची मुद्रास्फीति के साथ-साथ क्रमिक रूप से मजबूती का रुझान जारी रखी हुईं हैं। ये चार प्रमुख श्रेणियां मिलकर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के पांचवें हिस्से से भी ज्यादा के लिए जिम्मेदार होती हैं। फरवरी में अनाज और मुख्य खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति जहां 16.7 फीसदी तक बढ़ गई, वहीं दूध और उससे बने उत्पादों की ‘हेडलाइन रीडिंग’ 9.65 फीसदी तक पहुंच गई। फलों के मामले में यह रीडिंग (जनवरी के 2.93 फीसदी से) उछलकर 6.38 फीसदी को छू गई, वहीं मसालों के मामले में (21.1 फीसदी से) थोड़ा नीचे लुढ़क कर 20.2 फीसदी पर आ गई। इस साल संभावित रूप से एल नीनो की परिस्थिति पैदा होने की भविष्यवाणी के मद्देनजर खाद्य वस्तुओं की कीमतों के अनुमान शायद ही कोई उम्मीद जगाते हैं। लिहाजा,

नीति निर्माताओं को मुद्रास्फीति पर लगाम लगाने पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। उन्नत अर्थव्यवस्थाओं में मंदी के बढ़ते जोखिमों के बरक्स विकास की रफ्तार बनाए को लेकर बढ़ती अनिश्चितता से इस बात का जोखिम बढ़ रहा है कि ऊंची ऋण लागत कहीं उपभोग को और कम न कर दे। तिस पर, कीमतों में स्थायी रूप से स्थिरता लाने में नाकामी की वजह से मुद्रास्फीति जनित मंदी (स्टैगफ्लेशन) के हालात पैदा हो सकते हैं। जब तक जीएसटी को तर्कसंगत बनाने और ईंधन की कीमतों में कटौती जैसे आपूर्ति पक्ष से जुड़े उपायों में तेजी नहीं लाई जाएगी, समग्र व्यापक आर्थिक परिदृश्य चिंताजनक बना रहेगा।

This editorial has been translated from English, which can be read here.

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